मेरा काव्य

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

चाँद से कह दो



आओ ,
हम सब अपने व्यक्तित्व को फांसी दे दें 
क्योंकि मसीहा को लोग तभी मसीहा कहतें हैं 
जब वह सूली चढ़ता है /
शब्दों को दोहराता न हो 
समय ऐसे क्षितिज की मांग करता है /
हारे हुए चाँद से हमें कोई प्यार नहीं 
उससे कहो राहु का क़त्ल करदे 
अथवा आसमान खाली कर दे 
हम उस में कोई नया चाँद उगा लेंगे 
या राहु को ही हम अपना चाँद बना लेंगे 
शराफत के प्याले मैं 
वगावत का शर्बत समा नहीं सकेगा
रोष के खौलते दूध में
विद्वेष का नीबू मत निचोड़ो 
अन्यथा दूध फट जायेगा 
इस तरह तो प्यासे का पानी से संबध ही कट जायेगा ?
अहिंसा की चादर इतनी छोटी है 
की पांव उस में न सिमटते हैं ,न पसरते हैं
ऊपर से हिंसा का शीत 
हड्डियों के ढांचे में सूखी बर्फ भर देना चाहता  है
ऐसे में एक ही निदान शेष है 
कि हम चादर फाड़ डालें 
या अपनी टाँगे काट लें /   
                    
                               कवि सुशील विचित्र 

1 टिप्पणी:

  1. मसीहा को लोग तभी मसीहा कहते है जब वह फाँसी चढता है .......
    सुन्दर अभिव्यक्ति ...... आभार ।

    जवाब देंहटाएं