मेरा काव्य

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

जले हुए जंगल के बीच



                          
मानवता के जले हुए जंगल के बीच
झोपड़ी नुमा संस्कारों की लाश पर
परम्पराएँ  उदास बैठी हैं /
संवेदनाओं   की लाश के लिए कफ़न कहाँ से आयेगा 
वे यह सोंच नहीं पा रही हैं 
बकरियों के बीच रह रहें भेड़ियों के 
चेहरों पर से नकाब नोंच नहीं पा रही हैं 
इसीलिए पांच साल तक 
क्रोध की भट्टी में जलने के बाद भी 
वे हर बार हांर जाती हैं 
हारना उनकी नियति बन गई है   
और सभ्यता के लिए दुर्गति बन गयी है 
उन की जीत पर  लगा हुआ प्रश्नवाचक चिन्ह 
चिरजीवी है ,शाश्वत है
इसलिए  परम्पराओं का मन बहुत आहत है 

जले हुए जंगल के बीच
 आहतमना परम्पराएँ , 
उदास ही नहीं चिंतित भी हैं |
उन के अन्दर एक अटूट भय सा है 
दरअसल उनकी नजर में 
जंगल का जलना 
अतीत ,वर्तमान तथा भविष्य का
 एक साथ जलने जैसा है /
                     कवि सुशील " विचित्र "

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