मेरा काव्य

शनिवार, 28 नवंबर 2015

उठो, उठो, उठो
बहुत अँधेरा है
परछाइयाँ तक छोड़ कर
चली गयी हैं हमारा साथ
गुंजलक मर कर वैठे अँधेरे के अजदहे से
भयभीत जुगनू भी
किसी अविरल झाड़ी के पीछे दुबक चुके हैं
और अँधेरे का मर्सिया पढ़ते पढ़ते चिराग भी थक चुके हैं
तो उठों , उठो , उठो
इस अँधेरे के खिलाफ
कहीं से रोशनी की चंद बूंदे ढूंढ  लाओ
जुगनुओं की सरपरस्ती करो
या फिर खुद मशाल की तरह जल जाओ
उठो उठो उठो /

उठो उठो उठो
बहुत अँधेरा है
आइनों में भी सूरते नजर नहीं आ  रही हैं
सुविधाभोगी परिवार पूजकों ने
राजसुख भोगने के लिए
लोकतंत्र को संसद के गलियारों में भटका दिया है
कालिमा के सौदागरों ने
काली वासनाओं की भित्ति पर ठुकी
चालाकियों की कील से
सूरज को पोस्टर की तरह लटका दिया है /
तो उठो उठो उठो






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