इतिहास को उलटा बांध दो
कुंठा की ढाल से वितृष्णा के प्रहार
रोंक तो सकते हो ,
मगर रग रग में बहते हुए ज्वालामुखी को
कैसे रोंक पाओगे /
फूलोंकी भीड़ की ओर कीड़े भी आकर्षित हो जाते हैं
काँटों की ओर कोई नजर नहीं फेंकता /
नीव में गड़ा पत्थर कोई नहीं देखता /
ताजमहल की सुन्दरता की चर्चा हर कोई करता
मगर बाईस हजार कटे हाथ बाले
मजदूरों के सौन्दर्य की चर्चा आज तक किसने की /
चुप रहो
इतिहास के कान होते हैं
वह बदगुमानी वर्दाशत नहीं कर सकता
अपने आदर्शों के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता ,
ऐसी बकवास करनें बालों की जीभें काट ली हैं
लेकिन हम हमीर हठी हैं
उसको हमारे सामने झुकना पड़ेगा
इतिहास को नंगे पावं होरी की झोपड़ी मैं घुसना पड़ेगा /
कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले
कृत्रिम खुशहाली के वर्णनों पर कालिख पोत कर
उन के स्थान पर
भूख से बिलखते बच्चों के रेखाचित्र खींच कर
कुतुबमीनार की सब से ऊँची मंजिल पर टांग दो
साथ मैं इतिहास को उल्टा बाँध दो
ताकि हमारे आदरणीय राजा
उधर से गुजरें तो देखें कि
अधबुझी आँखों बली जनता की आँखों में
सूरज का तेज उतर आया है
अब उस का झंडा न झुके गा
न टूटे गा
बल्कि उन के सर पर बज्र बन कर गिरे गा
जो लाशों का ताज पहन कर इठलातें हैं /
पोस्टेड बाई कवि सुशील दीक्षित विचित्र
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