मेरा काव्य

शनिवार, 27 नवंबर 2010

बातें करें


 बातें करें 
     
अपने लालच के हाथों से
मार कर विछाई गयी
विश्वास की लाश को
आस्था का कफ़न पहना कर
स्वार्थों की टिकटी पर बाँधने के बाद
आइये हम परमार्थ की बातें करें /

सुनतें हैं कि प्रजा का
प्रजातंत्र से बहुत घना रिश्ता है
जो पहले सुख देता होगा
अब नासूर की तरह रिसता है
तो आइये
पड़ोसी की पकी खड़ी फसल को पूरी श्रद्धा से
एक चिंगारी समर्पित करने के बाद
हम एकता की बातें करें

  

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