मेरा काव्य

शनिवार, 27 नवंबर 2010

उठो उठो उठो


उठो उठो उठो 
उठो , उठो , उठो , 
बहुत अन्धेरा है /
आइनों में भी सूरतें नजर नहीं आरहीं हैं
परछाइयाँ भी छोंड़ कर हमारा साथ /
गुंजलक मार कर बैठे अँधेरे के सांप से   
भयभीत जुगनू भी 
किसी अविरल झाड़ी के पीछे दुबक चुके हैं / 
और अँधेरे का मर्सिया पढ़ते पढ़ते 
दीपक भी थक चुके हैं /
तो , उठो उठो उठो , 
इस अन्धेरें के खिलाफ 
कहीं  से रोशनी की चंद लकीरें  खोज लाओ
या  फिर खुद मशाल बन कर जल जाओ /
उठो उठो उठो /


सुनों सुनों सुनों 
सुनों  सुनों सुनों 
मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो 
रेत में सिर गड़ा लेने से 
पागल हवाएं नहीं रुकती हैं /
और झील नदी या नहर का चित्र दिखला देने से 
प्यासे की प्यास नहीं बुझती है /
सुनो सुनो सुनो 
मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो 
निर्लज्ज शीत के तानों से 
धूप की रेशमी पीठ घायल है 
चांदनी की  बांह छिल
आदमी की आदमीयत पर से आस्था हिल गयी है /
इसलिए प्रगतिशील होने के दंभ में
सोंधी गंध बाली परम्पराओं की देह मत जलवाओ मेरे मित्र /
और यदि समूची मानवता की भलाई चाहते हो तो ,
भूखों की बस्ती में रोटियों पर सेमीनार मत करवाओ मेरे मित्र / 
    

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